ssnews कोटवार का अजब गजब खेला शासकीय जमीन को तीन बच्चों के नाम पर दर्ज कराने का आरोप, आखिर किस अधिकारी ने दिया शासकीय जमीन को चढ़ाने का आदेश,,,,
शासकीय जमीन को कोटवार के तीन बच्चों के नाम दर्ज करने का आरोप, आखिर किस अधिकारी ने दिया आदेश?
मस्तूरी तहसील के ग्राम पाराघाट का मामला; सरकारी जमीन के नामांतरण की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल
कैसे आँख बांधकर पटवारी तहसीलदार ने किया शासकीय जमीन को कोटवार के बच्चों के नाम पर दर्ज,होना चाहिए आदेश जारी करने वाले अधिकारी के खिलाफ कड़ी कार्यवाही।
स्वराज संदेश मस्तूरी। बिलासपुर जिले के मस्तूरी तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत पाराघाट में कोटवार को जीवनयापन के लिए आवंटित बताई जा रही शासकीय जमीन खसरा नंबर 598 को उसके तीन बच्चों के नाम दर्ज किए जाने का मामला सामने आया है। साथ ही संतोष दास के नाम पर एक और 524/2 खसरा दर्ज है जो अभी भी उनके नाम दर्ज है ।इस मामले ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली और जमीन के नामांतरण की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जमीन शासकीय थी, तो उसे कोटवार के बच्चों के नाम पर किस आधार पर दर्ज किया गया और इसके लिए किस अधिकारी ने आदेश पारित किया?
शासकीय जमीन निजी नामों पर कैसे दर्ज हुई?
मिली जानकारी के अनुसार, ग्राम पाराघाट में संबंधित कोटवार को जीवनयापन के लिए जमीन दिए जाने की बात कही जा रही है। आरोप है कि उक्त जमीन को बाद में कोटवार के तीन बच्चों के नाम पर राजस्व अभिलेखों में दर्ज करा दिया गया।
यदि यह जमीन वास्तव में शासकीय है और नियमानुसार केवल जीवनयापन के उद्देश्य से आवंटित की गई थी, तो इसके हस्तांतरण अथवा नामांतरण की वैधानिकता की जांच आवश्यक है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि जमीन किस श्रेणी की है, उसका आवंटन किन शर्तों पर किया गया था और बच्चों के नाम पर प्रविष्टि किस आदेश के आधार पर दर्ज की गई।
पटवारी से लेकर तहसीलदार तक की भूमिका जांच के दायरे में
राजस्व अभिलेखों में जमीन से संबंधित प्रविष्टियां निर्धारित प्रक्रिया के तहत की जाती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि संबंधित जमीन के रिकॉर्ड में बदलाव किस प्रक्रिया से हुआ? क्या इसके लिए कोई आवेदन प्रस्तुत किया गया था? क्या सक्षम राजस्व अधिकारी ने आदेश जारी किया था? यदि आदेश पारित हुआ, तो उसमें जमीन को बच्चों के नाम दर्ज करने का क्या आधार बताया गया है?
इस पूरे मामले में पटवारी की रिपोर्ट, राजस्व निरीक्षक की जांच, तहसीलदार अथवा अन्य सक्षम अधिकारी के आदेश और संबंधित राजस्व अभिलेखों की जांच से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
नियमों का उल्लंघन हुआ या प्रक्रिया के तहत हुआ नामांतरण?
शासकीय भूमि का आवंटन, हस्तांतरण और नामांतरण जमीन की श्रेणी तथा लागू नियमों के अनुसार ही किया जा सकता है। इसलिए केवल नाम दर्ज होने के आधार पर किसी अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। हालांकि, यदि शासकीय जमीन को नियमों के विपरीत निजी नामों पर दर्ज किया गया है, तो यह गंभीर जांच का विषय है।
मामले में यह भी पता लगाया जाना जरूरी है कि नामांतरण के दौरान किन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया और क्या संबंधित अधिकारियों ने जमीन की वास्तविक स्थिति का सत्यापन किया था।
प्रशासन से उठ रहे सवाल
इस मामले में संबंधित राजस्व अभिलेखों, आवंटन आदेश और नामांतरण संबंधी दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। प्रशासन को चाहिए कि जमीन की वर्तमान स्थिति और नामांतरण की वैधानिकता स्पष्ट करे, ताकि सरकारी भूमि के संबंध में किसी भी प्रकार की अनियमितता होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जा सके।
अब देखने वाली बात यह होगी कि राजस्व विभाग इस मामले में जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाता है या नहीं।प्रकाशन से पहले जरूरी जानकारी: यदि आपके पास जमीन का खसरा नंबर, नामांतरण आदेश की प्रति या संबंधित राजस्व रिकॉर्ड है, तो उसके आधार पर खबर को और तथ्यात्मक बनाया जा सकता है। इससे यह स्पष्ट करने में मदद मिलेगी कि आदेश किस अधिकारी ने पारित किया और जमीन किस श्रेणी की है।
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